गुरुदेव की जीवनी को प्रकृति का प्रमाणिकरण
संसार का इतिहास अक्सर युद्धों, साम्राज्यों और भौतिक क्रांतियों के उल्लेख के साथ लिखा जाता है। लेकिन आध्यात्मिक दुनिया का इतिहास, या कहें कि आत्म जागरण और आत्म साक्षात्कार का इतिहास मौन रह कर, अंधेरे कमरों में श्वासों की डोर पकड़ कर अपने हृदय के भावों के सागर में गहरे उतर कर अपने ही भावों से उत्पन्न वैचारिक दबाव में अत्यंत कठिन प्रयासों से स्वयं के सत्य को जानते हुए लिखा जाता है और लाखों प्रयास करने वाले अथवा कहें कि आध्यात्मिक संसार के क्रांतिकारियों में से कोई एक नायाब व्यक्ति कामयाब होता है और वह महान व्यक्ति जब अपनी कामयाबी की कहानी कहता है तब भी उसका उद्देश्य स्वयं की प्रसिद्धि नहीं बल्कि आध्यात्मिक दुनिया के किसी और क्रांतिकारी को मार्ग दिखाना उनका ध्येय होता है। क्योंकि कामयाब होते-होते सिद्धि प्रसिद्धि जैसे विचार उनके लिये गौड़ हो जाते हैं। जब ये घटित होता है तो दृश्य और अदृश्य जगत का मिलन होना अवश्यंभावी हो जाता है या कहें कि प्रकृति भी इस महान कामयाबी का उत्सव अपने तरीके से मनाती है क्योंकि इस मार्ग के अग्रज जो कामयाब हो कर,प्रकृतिस्थ हो कर अलग आयामों में स्थापित हो गये हैं वो अपने विश्व विद्यालय के नायब विद्यार्थी के उत्साह वर्धन के लिये अवश्य आते हैं।
10 जुलाई 2026 का दिन क्रिया योग परंपरा और संपूर्ण मानव चेतना के इतिहास में एक और आलौकिक अध्याय के रूप में दर्ज हो गया। ये अवसर था परम पूज्यनीय गुरुदेव के 69वें जन्मोत्सव और उनकी दिव्य जीवनी “शैलेन्द्र एक श्मशानवासी की जीवन कथा” के भव्य और दिव्य विमोचन समारोह का,यह आयोजन जन्मोत्सव या पुस्तक विमोचन का तो प्रत्यक्ष रूप में दिखाई दे रहा था, इसकी पृष्ठभूमि में एक और अत्यंत गूढ़ तथ्य था गुरुदेव की एक अत्यंत गुप्त और महान साधना का चक्र भी पूर्ण हो रहा था। गुरुदेव अक्सर अपनी वार्ताओं में अवगत कराते रहते थे कि हमारी परंपरा के आदिगुरु बाबा जी महाराज ने उन्हें स्वयं एक विशिष्ट क्रिया प्रदान की है जिसे 57वें जन्मदिवस से अभ्यास प्रारंभ करने का निर्देश दिया है। 10 जुलाई 2026 का यह पावन दिन उस महान साधना के ठीक 12 वर्ष पूर्ण होने का भी साक्षी था।
हम सभी क्रिया अभ्यासी 12 संख्या और उसके गुणांकों का योगिक क्रियाओं में महत्व से भलीभाँति परिचित हैं। 12 वर्ष की अवधि एक पूर्ण तप चक्र का द्योतक है। गुरुदेव के इस तप चक्र से उत्पन्न ऊर्जा पूरी तरह परिपक्व हो कर प्रवाहित होने के लिये इस दिन तैयार हो चुकी होगी ऐसा मेरा अनुमान है। इस क्रिया को 12 वर्ष तक निरंतर निर्विघ्न रूप से श्मशान में अभ्यास करने वाला साधक भी तो अनेक युगों में कोई विरला ही होता होगा। तो फिर ऐसे महान अवसर पर इस मार्ग के पूर्ववर्ती, अदृश्य महान विभूतियाँ, श्मशान की शक्तियाँ अपनी उपस्थिति दर्ज न करायें ऐसा कैसे हो सकता है?
यह विमोचन समारोह संसार के क्या इस लोक या कहें कि गृह के सबसे सुंदर और दिव्य ऐतिहासिक परिसर में आयोजित हो रहा था।
▪ जहाँ द्वापर में स्वयं भगवान श्री कृष्ण ने अपनी पटरानियों की उत्तर क्रियाओं की पूर्ण आहुति दी।
▪ जहाँ कृष्ण के बाल सखा उद्धव ने भागवत कथा का उपदेश दिया।
▪ पंचतीर्थ कुण्ड के किनारे इस समारोह का मंच सजा था।
▪ जहाँ आदिनाथ शिवशंकर का अवधूत स्वरूप स्वयं प्रकट होकर स्थापित है।
▪ जहाँ आदिशक्ति विराजमान हैं।
▪ जहाँ बाबा जी महाराज का नित्य निवास है।
▪ जहाँ पवन पुत्र हनुमान का जागृत कंचन वर्ण विग्रह स्थापित है।
▪ जहाँ भैरव की अनेकोनेक दिव्य शक्तियों की लीलाएँ नित होती रहती हैं।
वे सब और उनकी सहायक शक्तियाँ इस पावन दिन पर अपनी उपस्थिति दर्ज न करायें ऐसा कैसे हो सकता है !
ऐसे दिव्य पीठ पर जब गुरुदेव अपने 12 वर्षों के तप चक्र की ऊर्जा के साथ अपनी जीवन गाथा की विमोचन विधि के लिये पधार रहे थे तो अदृश्य सूक्ष्म जगत की शक्तियों का उपस्थित होना अवश्यंभावी था। जैसे ही गुरुदेव बैठक हाल से पुस्तक की लेखिका बहन शुभ्रा के साथ मंच की ओर अग्रसर हुये संपूर्ण परिसर एक अविश्वसनीय और आलौकिक ऊर्जा से सरोबार हो गया। दिन भर की भयंकर उमस भरी भीषण गर्मी क्षण भर में गायब हो गयी। अचानक आसमान में गहरे घने काले बादल छा गये। सरसर ठंडी तेज हवा बहने लगी। वातावरण में एक आलौकिक ऊर्जा का ठहराव स्थापित हो गया। मंचीय व्यवस्थाओं में आंशिक व्यवधान उत्पन्न हुआ और आसमान से गड़गड़ाती बिजली की चमक के साथ तेज बारिश प्रारंभ हो गयी। किसी को कुछ समझ नहीं आ रहा था अब कैसे और क्या करना है। आता भी कैसे मानव मस्तिष्क की अपनी सीमाएँ हैं और इस समारोह का संपूर्ण संचालन दिव्य शक्तियों ने अपने हाथों में ले लिया था और इस समारोह को अपने अनुसार मनाने का निर्णय ले लिया था।
फुसफुसाहट और चर्चाओं के धीमे स्वर कानों में पड़ने लगे कि अब बारिश नहीं रुकेगी, कार्यक्रम नहीं हो सकेगा। इस माहौल में यदि कोई हताश नहीं था तो नेहा बहन उन्हें विश्वास था कार्यक्रम अवश्य होगा और गुरु जी दोहरा रहे थे मुझे तो नेहा के विश्वास पर विश्वास है सब ठीक होगा। और मेरे कानों में दोपहर में चारु मोहन के गाये गाने की पंक्तियाँ गूँज रही थीं “प्यार हमें किस मोड़ पर ले आया अब दिल करे हाय, कोई ये बताये…..क्या होगा आगे – और उन्होंने बार गाया था सब ठीक होगा, सब ठीक होगा….”
मेरी स्मृति में ऐसे अनेक प्रकरण थे जब गुरुदेव का नाम ले कर बादलों से बरसने से रुकने को कहा जाता था तो चमत्कारिक रूप से बारिश रुक जाती थी। मैं मन ही मन गुरुदेव से प्रार्थना कर रहा था। प्रभु इस बारिश को रुकवा दो कुछ समय के लिये और ठीक उसी समय गुरु जी ने आद्या को बुलाया और बोला जाओ बादलों से कहो अब बहुत हो गया। गुरु जी कह रहे हैं रुक जाओ, आद्या आदेश मिलते ही गयी और आसमान में नृत्य कर रहे बादलों को गुरु जी का संदेश दिया। गुरु जी ने घोषणा की कि 10 मिनट के अंदर बारिश थम जायेगी तैयार रहो और कार्यक्रम को संपन्न करो और फिर वे बारिश रुकने की पल पल की रिपोर्टें तो हम लोगों से लेने लगे। मेरे साथ वहाँ उपस्थित लोगों ने देखा पहले पाँच मिनट में भयंकर तेज बारिश की गति लगभग 70 प्रतिशत रह गयी। अब मायूस होने की बारी उन लोगों की थी जो भविष्यवाणी कर चुके थे कि ये बारिश थमने वाली नहीं है और हमारी पूरी टीम उत्साहित थी। नयी तरंग में गुरु बहन ईरा ने थमती बारिश की बूंदों की थाप के साथ अपना अग्नि नृत्य प्रारंभ करने की आज्ञा गुरुजी से ली और पूर्ण उत्साह के साथ अपना नृत्य प्रारंभ किया। अब हम एक और अद्भुत दृश्य देख रहे थे। पानी की बूंदों की थाप पर अग्नि नृत्य क्या समां था। उस पावर कट के घने अंधेरे में परिसर में मोबाइल फोनों की torch lights जगमगाने और लहराने लगीं। ऐसा लग रहा था मानो नृत्यांगना के साथ ताल मिलाते हुये वे अदृश्य शक्तियाँ मोबाइल torch lights का आधार ले कर नृत्य कर रही हों। पूरा परिसर नयी उमंग और उत्साह से एक बार फिर भर गया। इस नृत्य के पूर्ण होते-होते बारिश पूरी तरह थम गई और हमारा विश्वास स्थापित भाव प्राप्त कर चुका था कि प्रकृति पुत्र के आह्वान को प्रकृति कभी अनसुना नहीं करती। उसकी प्रार्थना को सदैव सम्मान देती है।
और मेरा विचार परिपक्व हो रहा था कि ये बारिश व्यवधान थी ही नहीं। ये तो अदृश्य शक्तियों का अपना तरीका था उत्सव मनाने का, अपने तरीके से, अदृश्य सर्वशक्तिमान दिव्य सत्ताएँ शायद – महाकाल स्वयं, आदि शक्ति स्वयं, और शायद पवन पुत्र हनुमान या गिरिराज बाबा वे कौन थे ये तो गुरुजी जानते हैं लेकिन एक बात निश्चित थी ये सामान्य पर्यावरणीय घटना तो नहीं थी। कुछ अलौकिक घट रहा था। हो सकता है प्रकृति को आधार बना कर ये सब एक साथ उपस्थित हो कर गुरुदेव की जीवन गाथा रूपी इस कालजयी पुस्तक के प्रमाणीकरण पर अपने हस्ताक्षर अंकित कर रहे थे। मैंने अपने संक्षिप्त उद्बोधन में तत्समय ही उन दिव्य शक्तियों को प्रणाम निवेदित किया।
कार्यक्रम अपनी पूर्ण दिव्यता और भव्यता के साथ प्रारंभ हुआ, बिजली का आना, गुरुदेव का पुनः मंचासीन होना, संगीत की सुरमयी स्वर लहरियों का प्रवाह, छत्रियों की लाइटों का जलना और आतिशबाजी की चमक एक साथ, पूरे परिसर का जगमगाना और गुरुदेव के आशीष वचनों के साथ पुस्तक का विमोचन अद्भुत था। उसे कागज पर उतारने के लिये मेरा शब्दकोष कमतर साबित हो रहा है और हो भी क्यों नहीं, वे सब दिव्य था, आलौकिक था। एक संसारी के शब्दों में सामर्थ्य कहाँ होती है दिव्य घटनाओं को शब्दों की सीमाओं में बाँधने की, लेकिन ऊर्जा के उस दिव्य प्रवाह को उपस्थित प्रत्येक व्यक्ति ने महसूस किया और ऐसी घटनाओं को सिर्फ और सिर्फ महसूस किया जा सकता है। ठीक पुस्तक के विमोचन के समय एक और विस्मयकारी घटना घटित हुई। एक बड़ा सफेद उल्लू आसमान में उड़ता दिखाई दिया। ये यूँ नहीं उड़ रहा था, उसने पूरे कार्यक्रम स्थल के दो चक्कर लगाए। वहाँ उपस्थित प्रत्येक व्यक्ति ने इसे देखा और कुछ ने अपने मोबाइल से इस दृश्य को सुरक्षित भी किया। सफेद उल्लू मैंने तो इसके पहले सुना भी नहीं था, आज साक्षात देखा। प्राचीन मान्यताओं के अनुसार, अगर आपको अचानक सफेद उल्लू के दर्शन हो जाएँ, तो यह इस बात का संकेत है कि आपके जीवन में सुख-समृद्धि आने वाली है और माँ लक्ष्मी की कृपा आप पर बनी रहेगी। इसके दर्शन को भाग्य, धन की प्राप्ति और रुके हुए काम पूरे होने का सूचक माना गया है।
अब दूसरे दिन इस कार्यक्रम में घटित घटनाओं पर चर्चाओं का दौर प्रारंभ हुआ। दिव्यता की पराकाष्ठा तब और विस्मित कर देने वाली हो गयी जब उपस्थित लोगों के द्वारा मोबाइल से शूट किये गये चित्रों और चलचित्रों का अवलोकन किया और लोगों ने अपने अनुभव व्यक्त किये –
- एक वीडियो में घने बादलों में मंच के ऊपर ईश्वरीय चिन्ह ॐ की आकृति स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर हुई।
- एक चित्र में छतरी के ऊपर एक षटकोणीय प्रकाश पुंज दिखा।
- और एक दीदीजी और उनके भतीजे को मंच पर गुरुदेव के ऊपर एक सात-आठ फीट ऊँचा तीन फन वाले सर्प की आकृति दिखी। उन लोगों ने उस समय सोचा शायद मंच सजावट के लिये कोई आकृति बनाकर रखी गई होगी, जबकि वहाँ ऐसी कोई आकृति थी ही नहीं।
- एक चित्र में तो एक दम स्पष्ट रूप से एक दिव्य देवी की आकृति दिखाई दे रही है, शायद स्वयं आदि शक्ति।
अब ये क्या हो रहा था मन विस्मयकारी रोमांच से इतना भर गया कि अनेकोनेक विचार श्रृंखलाएँ मन में उदित हो रही थी यकीन मानिये इस वैचारिक हल चल के चलते मैं 11 जुलाई की रात सो नहीं सका मैं इन सबको जितना भी याद रह जाये संजोने की जुगत में लग गया और सुबह तक लगा रहा मस्तिष्क की तरंगें हाथों से प्रवाहित हो कर कागज पर अंकित होने लगीं।
ये सब साक्ष्य थे शक्तियों की उपस्थिति के उनके भौतिक प्रकटत्व का प्रमाणीकरण और उनकी घोषणा थी कि हम ही थे।
हाँ 10 जुलाई की रात की कार्यक्रम के बाद एक बहुत ही सुंदर, सुनहरी आभा लिये एक नागराज साक्षात प्रकट हुये सभी ने उनके दर्शन किये उनके अत्यन्त समीप जाकर फोटो खींचे, और वे बिना विचलन के अपना फन फैला कर दर्शन दे रहे थे फोटो खिंचवा रहे थे। सबसे अजीब बात ये थी कि उससे किसी को भय भी नहीं लग रहा था जो बहुत ही विस्मयकारी था।

सामान्यतः किसी जगह यदि कोबरा नाग प्रकट हो जाये तो भय व्याप्त हो जाता है, अब तो यह पूर्णतः स्पष्ट हो गया कि अवश्य ही दिव्य शक्ति नाग के रूप में वहाँ प्रमाणीकरण दे रही थीं। गोवर्धन में दंत कथा है कि गिरिराज बाबा भी नाग के रूप में दर्शन देते हैं। शायद वही हों?
दूसरे दिन इस पूरी घटना और चर्चा के बीच गुरुदेव ने मुस्कराते हुये लेकिन एक गंभीर और दृढ़ प्रश्न दाग दिया कि ये बताओ ये सब तो हो गया अब आगे क्या होगा? अनुमान लगाओ? हमेशा की तरह व्यक्ति स्तब्ध और मौन था कुछ सूझ ही नहीं रहा कि अब क्या होगा। दिमाग कुलाँचें भिड़ा रहा है मेरी अल्प बुद्धि में तो यही विचार आ रहा है, मैं गुरुदेव का पिछले 36 वर्षों से सानिध्य पा रहा हूँ। अनेक अद्भुत घटनाओं का साक्षी रहा हूँ। उन घटनाओं से निर्मित स्मृति के आधार पर चिंतन करता हूँ तो पाता हूँ कि गुरुदेव के जीवन की पटकथा स्वयं महाकाल लिखते हैं और बाबा जी उसके डायरेक्टर हैं और गुरुदेव उनके पात्र। अब गुरुदेव की जीवन गाथा जो अभी अभी प्रकाशित हुई है उसमें उन्होंने (महाकाल ने) एक नया पात्र जोड़ दिया। किसी भी चल चित्र में कोई भी दृश्य यूँ तो नहीं होता न, तो इसका भी कुछ तो मतलब होगा—अब शायद गुरुदेव के विचारों की अभिव्यक्ति की शाब्दिक ध्वनि की तरंगें अनेकोनेक पाठकों के अपने स्तर से उत्सर्जित होकर सामूहिक चेतना के रूप में भू देवी की चेतना के साथ चेतन्य ऊर्जा के रूप में सम्मिलित हो कर फलस्वरूप ब्रह्माण्ड के कोने-कोने में बैठा जो भी सत्य का वास्तविक अन्वेषक ईमानदारी से अपने स्वभाव को जानने का प्रयास करेगा वह अपने अभ्यास के दौरान इन वैचारिक दिव्य तरंगों को महसूस करेगा और उसे एक नई दिशा और प्रकाश का एक मूक मार्गदर्शन प्राप्त होगा। इस पुस्तक में व्याप्त विचारों की ऊर्जा का यह प्रभाव समस्त की व्याकुलताओं को भेद कर हर खोजी आत्मा को उसके लक्ष्य तक पहुँचाने में सहायक होगा। यही तो गुरु चेतना का मूल कार्य है।
इस जागृत श्मशान में बीते दो दिनों के क्षण स्मरण मात्र से रोमांच पैदा कर रहे हैं कि जब ये सब आलौकिक घटित हो रहा था, वे दिव्य विभूतियाँ उपस्थित थीं, तो मैं वहीं था भले ही उन्हें मैं नहीं देख सका। उनकी दृष्टि मुझ पर तो गयी होगी। अब आगे मेरे साथ क्या होगा – इसी प्रश्न के विचार साथ लौट रहा हूँ…
जय गुरु जी
विजयानंद
गोवर्धन मथुरा
11 जुलाई 2026
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3 comments
Vipul Arora
जय गुरुदेव जी।
आदरणीय विजयानंद जी, आपने केवल एक कार्यक्रम का वर्णन नहीं किया, बल्कि उस दिव्य अनुभूति को शब्दों का स्वरूप प्रदान किया है जिसे सामान्यतः केवल अनुभव किया जा सकता है। आपके लेख को पढ़ते हुए ऐसा प्रतीत हुआ मानो हम स्वयं उस पावन क्षण के साक्षी हों।
आपने आध्यात्मिक अनुभूतियों, प्रकृति के संकेतों और गुरुदेव की दिव्य उपस्थिति को जिस संवेदनशीलता, श्रद्धा और प्रवाहपूर्ण शैली में अभिव्यक्त किया है, वह अत्यंत प्रभावशाली है। यह लेख केवल घटनाओं का विवरण नहीं, बल्कि साधक के अंतर्मन से निकली अनुभूति का सजीव दस्तावेज है।
ऐसी कालजयी प्रस्तुति के लिए आपको हृदय से साधुवाद। गुरुदेव की कृपा से आपकी लेखनी निरंतर ऐसे ही दिव्य अनुभवों को शब्दों में पिरोती रहे और असंख्य साधकों के लिए प्रेरणा एवं मार्गदर्शन का माध्यम बने।
आपका बहुत बहुत आभार ।
जय गुरुदेव जी।
पुष्पेंद्र त्रिवेदी
आपकी कृपा सभी शिष्यों पर इसी तरह बन रहे।
शीला नरवरिया
बहुत ही चमत्कारी संध्या थी वो मैं सौभाग्य शाली हूं कि उन क्षणों की साक्षी होने का अवसर गुरु कृपा से मिला। बहन शुभ्रा ने गुरुदेव की जीवन गाथा को जिन शब्दों से सजाया है वो और भी अद्भुत है मै इस गाथा को पूरा पढ़ चुकी हूं। भाषा का प्रवाह ऐसा है कि लगता है सब कुछ घटित होते देख रही हूँ…..इस किताब को अवश्य पढ़िए चमत्कारी पुस्तक है…..