Preface to Yogeshwari: Shailendra Sharma’s Yogic Interpretation of the Gita
गीता का नियमित अध्ययन करने वाले विद्वान जानते हैं कि इसका विषय ब्रह्मविद्या एवं योगशास्त्र है। इस ग्रंथ में वर्णित पुरातन योग साधनाओं का अभ्यास करने से, प्रचण्ड तेजोमय कालस्वरूप भगवान् श्रीकृष्ण का साक्षात्कार प्राप्त किया जा सकता है।
पूर्व में इस महान ग्रंथ की कई व्याख्याएँ विद्वानों द्वारा की गई हैं। फिर भी मैं यह कहने की धृष्टता करता हूँ कि श्रीमद्भगवदगीता की किसी योगी द्वारा की गई यौगिक व्याख्या विद्वत समाज में देखने में नहीं आती।
अत्यंत दुर्लभ यौगिक व्याख्या लगभग सौ वर्ष पहले क्रियायोग के महान गुरु श्री श्यामाचरण लाहिड़ी महाशय ने अपने अंतरंग शिष्यों के लिए की थी। इस व्याख्या में उन्होंने गीता में वर्णित पुरातन योग-साधना का रहस्य अपने शिष्यों के हितार्थ खोला था।
देश और काल की परिस्थितियों को देखते हुए मुझे श्रीमद्भगवदगीता की एक सामयिक यौगिक व्याख्या की आवश्यकता महसूस हुई, जो सामान्य जन से लेकर योग विशेषज्ञों तक सभी के लिए उपयोगी हो सके।
मैं, शैलेन्द्र शर्मा, श्री हिम्मत बहादुर शर्मा और श्रीमती ज्ञानी देवी का सबसे छोटा पुत्र, स्वयं एक योगी,
इस व्याख्या में जो भी व्यक्त किया गया है वह इस गुरु परंपरा से प्राप्त ज्ञान और पुरातन योगकर्म के अभ्यास का परिणाम है। मैं अपने सभी शिष्यों को धन्यवाद देता हूँ जिन्होंने प्रश्न करके इस व्याख्या में कही गई बातों को मुझसे व्यक्त करवाने में मदद की।
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