योगिराज श्री शैलेन्द्र शर्मा द्वारा
श्रीमद्भगवदगीता की यौगिक व्याख्या
— अध्याय 5, श्लोक 7 & 12 —
श्लोक 7
योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः।
सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते।।७।।
पदच्छेद: योगयुक्तः, विशुद्धात्मा, विजितात्मा, जितेन्द्रियः,
सर्वभूतात्मभूतात्मा, कुर्वन्, अपि, न, लिप्यते।।७।।
अर्थ:
योगयुक्त विशुद्धात्मा, स्वयं को जीता हुआ जितेन्द्रिय, समस्त भूतों का आत्मा, वह कर्म करता हुआ भी उनसे लिप्त नहीं होता।
व्याख्या:
“योगी जब योग के अभ्यास के द्वारा अपने मस्तिष्क की समस्त क्षमताओं को जाग्रत् करके स्वयं विराट् हो जाता है और यह जान लेता है कि यह समस्त जगत् उस काल स्वरूप विराट् की ही अभिव्यक्ति है।
उस समय वह मात्र अन्यों को प्रेरणा देने के लिये कर्म करता हुआ भी उन कर्मों से परे ही रहता है।”
श्लोक 12
युक्तः कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम्।
अयुक्तः कामकारेण फले सक्तो निबध्यते।।१२।।
पदच्छेद: युक्तः, कर्मफलम्, त्यक्त्वा, शान्तिम्, आप्नोति, नैष्ठिकीम्,
अयुक्तः, कामकारेण, फले, सक्तः, निबध्यते।।१२।।
अर्थ:
योगयुक्त कर्मफल त्यागकर नैष्ठिक शांति को प्राप्त होते हैं।
अयुक्त पुरुष फल की कामना में आसक्त होकर बँध जाते हैं।
व्याख्या:
“योगियों के कर्म फल की आसक्ति के बिना ही किये जाते हैं और उनकी चेतना शरीर की सीमाओं से मुक्त हो जाने के कारण उनके समस्त कर्म उस अव्यक्त काल की शरण में रहते हुए काल के ही निमित्त होते हैं।
जो सामान्य व्यक्ति अपने मस्तिष्क की अनन्त क्षमताओं को चैतन्य करने के प्रति उदासीन रहता है, वह शारीरिक सीमाओं में ही सीमित रहने से कर्मबन्धन में फँसा रहता है।”
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